Daily Current Affairs (Hindi) - 08.03.2018


राष्ट्रीय


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मध्‍यस्‍थता और सुलह (संशोधन) विधयेक, 2018

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मध्‍यस्‍थता और सुलह (संशोधन) विधयेक, 2018 को लोकसभा में पेश करने की स्‍वीकृति दे दी है। यह विवादों के समाधान के लिए संस्‍थागत मध्‍यस्‍थता को प्रोत्‍साहित करने के सरकार के प्रयास का हिस्‍सा है और यह भारत को मजबूत वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) व्‍यवस्‍था का केंद्र बनाता है।1996 के अधिनियम में संशोधन से मानक तय करने, मध्‍यस्‍थता प्रक्रिया को पक्षकार सहज बनाने और मामले को समय से निष्‍पादित करने के लिए एक स्‍वतंत्र संस्‍था स्‍थापित करके संस्‍थागत मध्‍यस्‍थता में सुधार का लक्ष्‍य प्राप्‍त करने में सहायता मिलेगी।

उल्लेखनीय है कि मध्‍यस्‍थता प्रक्रिया को सहज बनाने, लागत सक्षम बनाने और मामले के शीघ्र निष्‍पादन और मध्‍यस्‍थता करने वाले की तटस्‍थता सुनिश्चित करने के लिए मध्‍यस्‍थताऔर सुलह अधिनियम, 1996 में मध्‍यस्‍थताऔर सुलह (संशोधन)अधिनियम, 2015 द्वारा संशोधन किया गया। लेकिन तदर्थ मध्‍यस्‍थता के स्‍थान पर संस्‍थागत मध्‍यस्‍थता को प्रोत्‍साहित करने और मध्‍यस्‍थता तथा सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 को लागू करने में आ रही कुछ व्‍यावहारिक कठिनाईयों को दूर करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारत के उच्‍चतम न्‍यायालय के सेवानिवृत्‍त न्‍यायाधीश, न्‍यायमूर्ति बी.एच. श्रीकृष्‍ण की अध्‍यक्षता में एक उच्‍च स्‍तरीय समिति (एचएलसी) बनाई गई।

प्रमुख विशेषताएं:

  • यह उच्‍चतम न्‍यायालय और उच्‍च न्‍यायालय द्वारा निर्दिष्‍ट मध्‍यस्‍थता संस्‍थानों के माध्‍यम से मध्‍यस्‍थों की तेजी से नियुक्ति में सहायक है, इस संबंध में न्‍यायालय से संपर्क की आवश्‍यकता के बिना। विधेयक में यह व्‍यवस्‍था है कि संबंधित पक्ष अंतरराष्‍ट्रीय वाणिज्यिक मध्‍यस्‍थताके लिए और संबंधित उच्‍च न्‍यायालयों के अन्‍य मामलों में उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा निर्दिष्‍ट मध्‍यस्‍थता संस्‍थानों से सीधा संपर्क कर सकते है।

  • इस संशोधन में एक स्‍वतंत्र संस्‍था भारत की मध्‍यस्‍थता परिषद (एसीआई) बनाने का प्रावधान है। यह संस्‍था मध्‍यस्‍थता करने वालों संस्‍थानों को ग्रेड देगी और नियम तय करके मध्‍यस्‍थता करने वालों को मान्‍यता प्रदान करेगी और वैसे सभी कदम उठाएगी जो मध्‍यस्‍थता, सुलह तथा अन्‍य वैकिल्‍पक समाधान व्‍यवस्‍था को बढ़ावा देंगे और संस्‍था इस उद्देश्‍य के लिए मध्‍यस्‍थतातथा वैकल्पिक विवाद समाधान व्‍यवस्‍था से जुड़े सभी मामलों में पेशेवर मानकों को बनाने के लिए नीति और दिशा निर्देश तय करेगी। यह परिषद सभी मध्‍यस्‍थता वाले निर्णयों का इलेक्‍ट्रोनिक डिपोजिटरी रखेगी।

  • एसीआई निकाय निगम होगी। एसीआई के अध्‍यक्ष वह व्‍यक्ति होगा जो उच्‍चतम न्‍यायालय का न्‍यायाधीश रहा हो या किसी उच्‍च न्‍यायालय का मुख्‍य न्‍यायाधीश और न्‍यायाधीश रहा हो। अन्‍य सदस्‍यों में सरकारी नामित लोगों के अतिरिक्‍त जाने-माने शिक्षाविद आदि शामिल किए जाएंगे।

विधेयक समय-सीमा से अंतरराष्‍ट्रीय मध्‍यस्‍थताको अलग करके तथा अन्‍य मध्‍यस्‍थताओं में निर्णय के लिए समय-सीमा विभिन्‍न पक्षों की दलीलें पूरी होने के 12 महीनों के अंदर करके सेक्‍शन 29ए के उप-सेक्‍शन (1) में संशोधन का प्रस्‍ताव है।

  • इसमें नया सेक्‍शन 42ए जोड़ने का प्रस्‍ताव है ताकि मध्‍यस्‍थता करने वाला व्‍यक्ति या मध्‍यस्‍थता संस्‍थान निर्णय के सिवाय मध्‍यस्‍थतासे जुड़ी कार्यवाहियों की गोपनीयता बनाए रखेंगें। नया सेक्‍शन 42बी मध्‍यस्‍थता करने वाले को मध्‍यस्‍थता सुनवाई के दौरान उसके किसी कदम या भूल को लेकर मुकदमा या कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है।

  • एक नया सेक्‍शन 87 जोड़ने का प्रस्‍ताव है जो स्‍पष्‍ट करेगा कि जब तक विभिन्‍न पक्ष सहमत नहीं होते संशोधन अधिनियम 2015 में - (ए) 2015 के संशोधन अधिनियम प्रारंभ होने से पहले शुरू हुई मध्‍यस्‍थता की कार्यवाही के मामले में (बी) संशोधन अधिनियम 2015 के प्रारंभ होने के पहले या ऐसी अदालती कार्यवाही शुरू होने के बावजूद मध्‍यस्‍थता प्रक्रिया के संबंध में चालू होने वाली अदालती कार्यवाहियों में लागू नहीं होगा तथा यह सेक्‍शन संशोधन अधिनियम 2015 के प्रारंभ होने या बाद की मध्‍यस्‍थता कार्यवाहियों में लागू होगा और ऐसी मध्‍यस्‍थता कार्यवाहियों से उपजी अदालती कार्यवाहियों के मामले में लागू होगा।


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व्‍यावसायिक अदालतों, व्‍यावसायिक डिवीजन और उच्‍च न्‍यायालयों की व्‍यावसायिक डिवीजन (संशोधन) विधेयक 2018

केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने संसद में पेश करने के लिए व्‍यावसायिक अदालतों, व्‍यावसायिक डिवीजन और उच्‍च न्‍यायालयों की व्‍यावसायिक डिवीजन (संशोधन) विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी है।

विधेयक में व्‍यावसायिक विवाद के निर्दिष्‍ट मूल्‍य को वर्तमान एक करोड़ रूपये से कम करके तीन लाख रूपये कर दिया गया है : अत: तर्कसंगत मूल्‍य के व्‍यावसायिक विवादों का निपटारा व्‍यावसायिक अदालतों द्वारा किया जा सकता है। इससे कम मूल्‍य के व्‍यावसायिक विवादों के समाधान में लगने वाले समय (वर्तमान में 1445 दिन) को कम किया जा सकेगा और ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस में भारत की रैंकिंग को सुधारा जा सकेगा।

  • संशोधन में उन क्षेत्रों के लिए जिला न्‍यायाधीश के स्‍तर पर व्‍यावसायिक अदालतों की स्‍थापना की व्‍यवस्‍था की गई है, जिन पर सम्‍बद्ध उच्‍च न्‍यायालयों में मूलरूप से सामान्‍य दीवानी न्‍याय का अधिकार है जैसे चेन्‍नई, दिल्‍ली, कोलकाता, मुंबई और हिमाचल प्रदेश राज्‍य में।
  • ऐसे क्षेत्रों में राज्‍य सरकारें अधिसूचना के जरिये जिला स्‍तर पर निर्णय दिये जाने वाले व्‍यावसायिक विवादों के आर्थिक मूल्‍य निर्दिष्‍ट कर सकती हैं, जो तीन लाख रुपये से कम और जिला अदालत के धन संबंधी मूल्‍य से अधिक नहीं हो।
    मूल रूप से सामान्‍य अधिकार क्षेत्र का इस्‍तेमाल करने के अलावा उच्‍च न्‍यायालयों के अधिकार क्षेत्र में जिला न्‍यायाधीश के स्‍तर से कम व्‍यावसायिक अदालतों द्वारा निपटाए गए व्‍यावसायिक विवादों में अपील का एक मंच जिला न्‍यायाधीश स्‍तर पर व्‍यावसायिक अपीलीय अदालतों के रूप में प्रदान किया जाएगा।
  • ऐसे मामलों में जहां तुरंत, अंतरिम राहत राहत पर विचार नहीं किया गया है, वहां संस्‍थान पूर्व मध्‍यस्‍थता प्रक्रिया की शुरूआत करके सम्‍बद्ध पक्षों को विधि सेवा प्राधिकार कानून 1987 के अंतर्गत गठित प्राधिकारों के जरिये अदालतों के दायरे से बाहर व्‍यावसायिक विवादों का निपटारा करने का अवसर मिलेगा। इससे व्‍यावसायिक विवादों के निपटारे में निवेशकों का विश्‍वास बहाल करने में भी मदद मिलेगी।नये अनुच्‍छेद 21-ए को शामिल करने से केंद्र सरकार पीआईएम के लिए नियम और प्रक्रियाएं तैयार कर सकेगी।
  • संशोधन को भावी प्रभाव देने के लिए ताकि न्‍यायिक कानून के प्रावधानों के अनुसार मौजूदा प्रावधान के अनुसार वर्तमान में व्‍यावसायिक विवादों के निर्णय देने वाले न्‍यायिक मंचों के अधिकार क्षेत्र में कोई बाधा न पड़े।
    तेजी से हो रहे आर्थिक विकास के साथ व्‍यावसायिक गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी हैं और साथ ही घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍यावसायिक विवादों में तेजी से वृद्धि हुई है। प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशों से व्‍यावसायिक लेन-देन में वृद्धि से व्‍यावसायिक विवादों की संख्‍या में पर्याप्‍त वृद्धि हुई है|
  • व्‍यावसायिक विवादों से जुड़े मामलों के तेजी से निपटारे को ध्‍यान में रखते हुए और खासतौर से विदेशी निवेशकों के बीच भारतीय विधि प्रणाली की स्‍वतंत्र और उत्‍तरदायी सकारात्‍मक छवि बनाने के लिए, व्‍यावसायिक अदालतों, व्‍यावसायिक डिविजन और उच्‍च न्‍यायालयों के व्‍यावसायिक अपीलीय डिविजन कानून 2015 अमल में लाया गया था और सभी न्‍यायिक क्षेत्रों में जिला स्‍तरों पर व्‍यावसायिक अदालतें स्‍थापित की गई।

अर्थव्यवस्था


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दूरसंचार क्षेत्र में भारग्रस्‍त परिसंपत्तियों पर अंतर-मंत्रालय समूह की सिफारिशों को मंजूरी

07 मार्च को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दूरसंचार क्षेत्र में निवेश, क्षेत्र की मजबूती तथा व्‍यावसायिक सहजता बढ़ाने के लिए दो महत्‍वपूर्ण कदमों को अपनी स्‍वीकृति दे दी।

स्‍पेक्‍ट्रम के लिए दूरसंचार सेवाप्रदाओं की स्‍थगित भुगतान देनदारियों को नया ढांचा देना-वर्तमान में स्‍वीकृत 10 किश्‍तों के अतिरिक्‍त अधिकतम किश्‍तों (अधिकतम 16 किश्‍त) का विकल्‍प चुनने का एक बार का अवसर प्रदान करके। बढ़ाई गई किश्‍तें इस सिद्धांत पर आधारित हैं कि बकाये भुगतान का शुद्ध वर्तमान मूल्‍य (एनपीवी) 2012 से स्‍पेक्‍ट्रम नीलामी के लिए आवेदन आमंत्रित करने संबंधी नोटिस के अनुसार संरक्षित है। कुल प्राप्‍त की गई राशि 2034-35 तक 74446.01 करोड़ रु. तक अधिक होगी।

स्‍पेक्‍ट्रम रखने के लिए अधिकतम सीमा में संशोधन-ट्राई तथा दूरसंचार आयोग की सिफारिशों के आधार पर मंत्रिमंडल ने स्‍पेक्‍ट्रम रखने की अधिकतम सीमा में संशोधन को भी अपनी मंजूरी दे दी जो इस प्रकार हैं:-

  • समग्र स्‍पेक्‍ट्रम सीमा वर्तमान 25 प्रतिशत से संशोधित करके 35 प्रतिशत की गई।वर्तमान इंट्रा-बैंड सीमा समाप्‍त कर दी गई है। इसके बदले सब-1 गीगाहर्ट्स बैंडों (700 मेगाहर्ट्स, 800 मेगाहर्ट्स तथा 900 मेगाहर्ट्स बैंडों) में सम्मिलित स्‍पेक्‍ट्रम रखने पर 50 प्रतिशत की सीमा तय की गई है।
  • 1 गीगाहर्ट्सबैंड से ऊपर व्‍यक्तिगत और सम्मिलित रूप से स्‍पेक्‍ट्रम रखने के लिए कोई सीमा नहीं होगी।विश्‍व रेडियो संचार सम्‍मेलन (डब्‍ल्‍यूआरसी) 2019 की अंतिम कार्रवाई के बाद संशोधित स्‍पेक्‍ट्रम की अधिकतम सीमाओं में संशोधन किया जा सकता है।
  • ट्राई ने प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रगति, स्‍पेक्‍ट्रम के सक्षम उपयोग, क्षेत्र की मजबूती में सहायक उपायों को ध्‍यान में रखते हुए स्‍पेक्‍ट्रम रखने के लिए वर्तमान अधिकतम सीमाओं में संशोधन की सिफारिश की थी।
  • स्‍थगित भुगतान देनदारी को नया ढांचा देने के साथ ही दूरसंचार सेवा प्रदाओं के लिए नकदी प्रवाह बढ़ेगा और उन्‍हें कुछ राहत मिलेगी। स्‍पेक्‍ट्रम रखने की अधिकतम सीमा में संशोधन से दूरसंचार लाइसेंसधारियों में मजबूती आएगी और इससे भविष्‍य में होने वाली नीलामियों में भागीदारी को प्रोत्‍साहन मिलेगा।

भारत- विश्व


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पर्यावरण के क्षेत्र में भारत और फ्रांस के बीच सहयोग-समझौता को मंजूरी

  • इस सहयोग-समझौते से दोनों देशों के बीच पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए नजदीकी और दीर्घकालीन सहयोग को प्रोत्‍साहन देने में मदद मिलेगी।
  • इसके तहत बराबरी, पारस्‍परिक सहयोग और आपसी लाभ के मद्देनजर दोनों देशों के वैधानिक कानूनों के आधार पर सहयोग होगा।
  • इस सहयोग-समझौते से बेहतर पर्यावरण सुरक्षा, बे‍हतर संरक्षण, जलवायु परिवर्तन का बेहतर प्रबंधन और वन्‍यजीव सुरक्षा/संरक्षण के लिए आधुनिक प्रोद्योगिकियों और उत्‍कृष्‍ट व्‍यवहारों के क्षेत्र में सहायता मिलेगी।

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भारत और फ्रांस के बीच प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी समझौते पर हस्‍ताक्षर को मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और फ्रांस के बीच प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी समझौते पर हस्‍ताक्षर को मंजूरी दे दी है। समझौते पर फ्रांस के राष्‍ट्रपति की आगामी भारत यात्रा के दौरान हस्‍ताक्षर होने की उम्‍मीद है।

  • समझौता दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने, छात्रों, शिक्षाविदों, अनुसंधानकर्ताओं और कौशल प्राप्‍त व्‍यावसायियों की आवाजाही बढ़ाने तथा दोनों पक्षों के बीच अवैध प्रवासन तथा मानव तस्‍करी से जुड़े मुद्दों पर सहयोग मजबूत करने की दिशा में महत्‍वपूर्ण मील का पत्‍थर साबित होगा।
  • यह समझौता फ्रांस के साथ भारत के तेजी से बढ़ते संबंधों का गवाह है और दोनों पक्षों के बीच बढ़ते विश्‍वास और आत्‍मविश्‍वास का प्रतीक है।
  • समझौता आरंभ में सात वर्ष की अवधि के लिए वैध होगा। समझौते में इसके स्‍वत: नवीकरण और एक संयुक्‍त कार्य दल के जरिये निगरानी तंत्र के प्रावधान को शमिल किया गया है।